इंदौर इतना साफ़ है क्यों ?
by nilesh.thakur04 · August 30, 2025
“दोस्तों, भारत में एक शहर है… जो बाकी शहरों को हर साल सफाई की क्लास पढ़ाता है। नाम सुना होगा – इंदौर! हाँ वही, जो ‘क्लीन इंडिया’ का ब्रांड एंबेसडर है। तो आज मैं नीलेश राजपूत आज आपके साथ यही बात करने वाला हूँ
खैर इंदौर पिछले कुछ सालो से पहले नंबर पर है इस बात को लेकर एक शहर और वहां के लोगो की व्यथा सुनते है
भाई इंदौर को आखिर साफ़ सफाई में नंबर १ आकर मिला क्या। हमे देखो बिना साफ़ सफाई के भी वही योजनाओँ का लुत्फ़ उठा रहे जो इंदौर वाले ले रहे | हाँ अगर सरकार लाड़ली बहना , सुकन्या , लाड़ली बेटी जैसी कोई लाडला इंदौर योजना लेकर आये और इंदौर वालो के अकाउंट में १००० रूपये दे तो हम भी कुछ करें | फिर शायद एक दो दिन शहर बंद , भारत बंद का नारा लगाकर रैली निकालने में भी मज़ा आये | अगर साफ़ सफाई में नंबर १ आने से कोई फायदा नहीं तो क्यों ही करना साफ़ सफाई ,लोग बिना फायदे के माँ बाप को नहीं रख रहे तो हम साफ़ क्यों रहे।
इंदौर के नगर निगम के कर्मचारियों और लोगो को देखो बेचारे दिन रात लगे रहते ,सूखा कचरा और गीला कचरा अलग अलग करने ,हमे देखिये आजादी और फुर्सत से अपनी ज़िंदगी जी रहे है कचरा तो कचरा होता है उसमे अलग क्या करना | हमारे दिमाग में भी तो कचरा भरा हुआ है हमने कभी भेदभाव नहीं किया सब भर लिया |
हमने सुना इंदौर वाले प्लास्टिक कचरे से रोड बनाने की सोच रहे बताओ तो क्या करेंगे रोड बनाकर | जब प्लास्टिक से रोड बनाना ही है तो प्लास्टिक को रोड पर ही फेंक दो | बताओ उसके लिए इतनी मेहनत क्यों ही करना। अब रोड, ख़राब प्लास्टिक से बने या सीमेंट से उसे उखाड़ना पहली बरसात में ही है क्यूंकि हमारे ठेकदार भी तो कचरा ही है
देखो भाई हमारे लिए खाली प्लाट , सड़क के किनारे , बस की खिडक़ी , किसी बिल्डिंग की सीढ़ियों का कोना ,ये सब गुटखा थूकने और कचरा फेकने की जगह है हम तो हमारे बच्चो के दिमाग में भी भूसा भरके रख रहे है सुना है भूसे में मशरूम उगते है और वो महंगे बिकते है
अब गाड़ी की खिड़की से केले के छिलके फेकने और बस खिड़की से पुचुक करके गुटखा थूकने का मज़ा ये इंदौर वाले समझ नहीं पाएंगे। इनकी साफ़ सुथरी ज़िंदगी में ये मज़ा लेना इनके बस की बात नहीं। अब आप ही बताओ अगर गंदगी नहीं होगी तो लोग स्वस्थ रहेंगे। स्वस्थ रहेंगे तो बीमार नहीं होंगे और बीमार नहीं होंगे तो हॉस्पिटल नहीं जायेंगे। अब अगर हॉस्पिटल नहीं जायेंगे तो हमने इतने बड़े बड़े सरकारी अस्तपताल बना रखे है उनका क्या होगा वहां जो लोग काम कर रहे वो बेचारे कहाँ जायेंगे। उनके पास कुछ काम ना होगा तो हमे अच्छा कैसे लगेगा।
देखिये हमे धरती माँ और प्रकृति का वरदान मिला हुआ है हम कचरा करते है हमारे निगम के कर्मचारी कचरा उठाते नहीं है हम और कचरा करते जाते है बरसात होती है कचरा बह जाता है या ज़मीन के अंदर चला जाता है और आप मानेंगे नहीं ये सब अपने आप होता है हमे इसमें कुछ नहीं करना होता। हर बरसात के बाद हमारी रोड और खाली प्लाट चकाचक हो जाते है अब वैज्ञानिक कुछ भी बोले की अंडरवाटर इससे ख़राब होता है और पीने के पानी ख़राब होता है अब इनको कौन बताये की हमने तो पहले से ही महंगी कंपनी का RO वाटर प्यूरी फायर लगाकर रखा हुआ है उसका भी तो उपयोग होना चाइये ना , अगर पानी गन्दा नहीं होगा तो RO का मतलब ही क्या।
साफ़ सफाई कोई काम नहीं, मानसिकता है जो इंदौर के लोग और वहां के प्रशासन ने बदल ली ,अब ये उनके लिए कोई काम नहीं बल्कि ज़िम्मेदारी है जिसे वो पिछले कुछ सालो से बखूबी निभा रहे | अब बाकि शहरो को भी अपनी मानसिकता बदल लेना चाइये धन्यवाद